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Wednesday, February 1, 2023
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टकराव : आधी आबादी से जुड़े हर फैसले पर क्यों उठता है विवाद

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इस बार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के फैसले पर हो रहा विवाद

देश में लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ा कर 21 साल करने के प्रस्ताव पर केंद्रीय कैबिनेट की मुहर लग गयी है और अब इसे कानूनी शक्ल देने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन किया जायेगा। इसके लिए केंद्र सरकार संसद में प्रस्ताव पेश करेगी। ज्यादातर लोगों ने सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है, लेकिन एक वर्ग विशेष के कुछ खास नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है। किसी ने कहा कि शादी के लिए लड़कियों की उम्र बढ़ने की बजाय घटनी चाहिए, तो किसी ने कहा कि लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ायी गयी, तो वे आवारगी करेंगी। खास बात यह है कि फैसले का विरोध एक खास तबके से हो रहा है, जो आज भी महिलाओं और लड़कियों को सिर्फ और सिर्फ उपभोग की वस्तु समझता है। हालांकि अब यह साफ हो गया है कि इस फैसले का मकसद महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना और उनके कैरियर को संवारना है, क्योंकि कम उम्र में शादी की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, पठन-पाठन पर भी असर पड़ता है। मोदी सरकार ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने का फैसला विशेषज्ञों की सलाह पर लिया है, लेकिन विरोध करनेवालों को इससे कोई मतलब नहीं है। यह बेहद दुखद है कि आधी आबादी से जुड़े किसी भी फैसले को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शक की निगाह से देखा जाने लगा है। यह भविष्य के लिए भी खराब है। लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के फैसले के पीछे के कारणों और इसके विरोध के औचित्य का परीक्षण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, यानी भारत इन दिनों एक नये और अर्थहीन विवाद में फंसा हुआ है। यह विवाद शादी के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के फैसले पर उठा है और फैसले का विरोध करनेवाले अजीबो-गरीब तर्क दे रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि यह फैसला विशेषज्ञों की सलाह पर लड़कियों के स्वास्थ्य और उनके कैरियर को ध्यान में रख कर किया गया है। वैसे यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी बाल विवाह जैसी रुढ़िवादी परंपराओं को निभाया जा रहा है। अगर आप अपनी गांव की जड़ों से जुड़े हुए हैं, तो यकीनन बीते सालों में आपने इस तरह के कुछ मामले तो जरूर देखे या सुने होंगे।

अभी जो कानून है, उसमें शादी के लिए लड़कों की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों की 18 साल है। लड़कियों की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के मोदी सरकार के फैसले के बाद लड़का-लड़की दोनों की शादी करने की उम्र एक समान, यानी 21 साल हो जायेगी। यहां एक सवाल यह उठता है कि आखिर शादी की कानूनन उम्र निर्धारित करने के पीछे का मुख्य कारण क्या है। यह सामाजिक मुद्दा है और इसे सामाजिक स्तर पर ही निबटना चाहिए। लेकिन भारत का इतिहास गवाह है कि यहां कोई भी मुद्दा, चाहे वह सामाजिक हो या पारिवारिक, राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना सुलझता नहीं है। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए उतना बड़ा सामाजिक आंदोलन चलाया, लेकिन उन्हें सफलता तब मिली, जब इस बारे में कानून लागू किया गया।

फैसले की पृष्ठभूमि
मोदी सरकार ने पिछले साल जून में समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया था और उसे बाल विवाह, मातृ मृत्य दर को कम करने के जरूरी कारण, महिलाओं और बच्चों में पोषण स्तर से जुड़े मामलों की जांच करने का काम सौंपा था। बता दें कि 1929 के तत्कालीन शारदा अधिनियम में संशोधन कर 1978 में लड़कियों की शादी की उम्र 15 वर्ष से बढ़ा कर 18 वर्ष कर दी गयी थी। अब 44 साल बाद इसे 21 वर्ष करने का फैसला केवल इसलिए किया गया है, क्योंकि जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, महिलाओं के लिए पढ़ने और काम करने के मौके खुल रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि लड़कियां 18 वर्ष की उम्र में मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व हो जाती हैं, लेकिन इसका यह मतलब तो कतई नहीं कि उन्हें तुरंत घर-परिवार की चक्की में झोंक दिया जाये। लड़कियों को भी कैरियर की उड़ान भरने के लिए लड़कों के समान अवसर दिये जाने चाहिए और इसके लिए 18 वर्ष की उम्र पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा देश में मातृ मृत्यु दर को कम करने की जरूरत है और इसके अलावा पोषण के स्तर पर भी सुधार करने की जरूरत है। एक लड़की मातृत्व में कब प्रवेश करती है, यह तय करना भी उसका अधिकार होना चाहिए, नेताओं का नहीं। इस टास्क फोर्स ने नीति आयोग को कुछ सिफारिशें की, जिनमें शादी के लिए लड़कियों की कानूनी उम्र को 18 से बढ़ा कर 21 करना शामिल था।

फैसले के विरोध में तर्क
मोदी सरकार के फैसले के विरोध में जो तर्क दिये जा रहे हैं, वे उस पितृसत्तात्मक समाज को ही प्रतिरूपित करते हैं, जो तीन तलाक जैसे मुद्दे का भी विरोध करता है। लड़कियां आवारा हो जायेंगी, प्रेम विवाह करने में अड़चन आयेगी, लिव-इन के मामले बढ़ेंगे, सांसद-विधायक चुन सकती हैं जीवन साथी क्यों नहीं और सामाजिक ताना-बाना कमजोर पड़ेगा, जैसे तर्क केवल यह बताने के लिए ही दिये जा रहे हैं कि हमारा समाज आज भी लड़कियों को लड़कों जितना अवसर देने में कंजूसी करता है। ऐसे तर्क देनेवाले यह नहीं सोचते कि लड़के भी तो 18 साल के बाद आवारगी करने लगते हैं, फिर उनके मामले में न्यूनतम उम्र 21 साल क्यों रखी गयी। इस फैसले का विरोध उस मानसिकता का परिचायक है, जिसमें आज भी लड़कियों को पर्दे में रहने और अपनी संपत्ति मानने का चलन है।

मोदी सरकार का यह फैसला 21वीं सदी के भारत की बेटियों को वे तमाम अवसर मुहैया कराने के लिए है, जिनसे लड़कियां अपना कैरियर खुद चुन सकती हैं। आकाश की ऊंचाइयों से लेकर महासागर की गहराइयों तक का अन्वेषण उनका अधिकार है और उन्हें इससे रोका नहीं जाना चाहिए। भारत के संविधान में जीवन का जो मौलिक अधिकार दिया गया है, उसका लाभ लड़कियों को भी मिले और मोदी सरकार के इस फैसले को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।

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