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समीक्षा : विधानसभा का शीतकालीन सत्र का समापन: झारखंड ने क्या पाया, क्या खोया

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  • झामुमो, कांग्रेस और भाजपा के हिस्से क्या आया!

संप्रभुता अभद्र नहीं होती। संसद सर्वोच्च संप्रभु संस्था है। विधि निर्मात्री है। संविधान संशोधन के अधिकार से लैस है। राज्यों की विधानसभा इसी की प्रतिछाया है। संसद हो या विधानसभा यह ‘जन’ यानी जनता का है। इसलिए इसके सदस्य ‘जनप्रतिनिधि’ कहलाते हैं। मौजूदा में संसद से लेकर विधानसभा तक जो हो रहा है, उसे कहीं से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। झारखंड विधानसभा का शीतकालीन सत्र समाप्त हो गया। पांच दिनों की बैठकों का लाभ किसे मिला? यह एक अहम सवाल है। क्योंकि जन के पैसे से, जन के लिए आयोजित कार्यवाही जन से ही दूर रह गयी। जनता से जुड़े सवाल धरे के रह गये। नाम मात्र के एक-दो सवाल के ही जवाब आये, वह भी आधे-अधूरे। ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकी। प्रश्नों पर सरकार द्वारा दिये गये लिखित जवाब में अधिकारियों की मनमर्जी दिखती है। अन्य सत्रों की तरह शीत सत्र का भी ज्यादातर समय हंगामे की भेंट चढ़ गया। इसके लिए सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्ष जिम्मेदार है। सत्ता पक्ष को भी कभी विपक्ष में बैठना पड़ता है और विपक्ष को भी कभी न कभी सत्ता मिलती है। झारखंड गठन के 20 साल हो चुके हैं, लेकिन बदलाव नहीं आया। मौजूदा सत्ता पक्ष कभी विपक्ष में था, तो वही हो रहा था, जो आज सत्ता पक्ष वाले विपक्ष में रह कर कर रहे। विधानसभा की कार्यवाही शोर-शराबा और हंगामे की भेंट चढ़ रही है। मौजूदा शीतकालीन सत्र की कायवाही, सदस्यों के आचरण और जन मुद्दों को तलाशती ‘आजाद सिपाही’ के राजनीतिक संपादक प्रशांत झा की रिपोर्ट।

जब से राष्ट्र का निर्माण हुआ, संभवत: तब से यह देखने, सुनने में आत रहा है कि राजनेता खुद को जनता का प्रतिनिधि कहते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था भी कुछ ऐसी ही है। जनता अपने क्षेत्र से प्रतिनिधि को चुनती है और उन्हें उस मुकाम पर पहुंचाती है, जहां से वह जनहित में काम कर सकें। इसलिए वह जनप्रतिनिधि कहलाते हैं। जनता यह नहीं देखती कि जनप्रतिनिधि सत्ता पक्ष में है या विपक्ष में। जनता यह चाहती कि जनप्रतिनिधि उनकी समस्याओं को दूर करे। विकास के लिए काम करे। अगर जनप्रतिनिधि सत्ताधारी दल का है तो जनता की सोच में इतना ही बदलाव आता है कि सरकार है, तो काम जल्दी, तेजी और आसानी से होगा। देश में कई ऐसे सांसद और विधायक हैं, जो सत्ताधारी दल के सदस्य नहीं हैं, फिर भी उन्होंने अपने क्षेत्र में बहुत कुछ किया है। वे जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशील हैं। जनता के बीच लोकप्रिय हैं। वहीं सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि इससे उलट भी दिखे हैं। जनता की समस्याओ से वे उदासीन रहे हैं। क्षेत्र में बहुत अधिक कुछ नहीं कर पाये।

जनप्रतिनिधियों को विशेष अधिकार दिया गया है। इस मामले में संविधान ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों को अलग-अलग नहीं बांटा है। इसलिए इस बात से पल्ला झाड़ लेना की सरकार हमारी नहीं है, हम क्या कर सकते हैं। हमारी जिम्मेदारी बहुत अधिक नहीं है, यह केवल बहलावे की बात हो सकती है।

भटक रही विधानसभा की कार्यवाही:
सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारी नहीं निभायेंगे, सदन में अगर सदस्यों के आचरण पर सवाल खड़े होंगे, सदन के अंदर शोर-शराबा, मारपीट, तोड़फोड़, अभद्रता होगी, सत्ता पक्ष की मनमानी चलेगी और विपक्ष का हर मुद्दे पर केवल विरोध और बायकॉट होगा, तो सदन से जनहित के सवाल इसी तरह गायब होते रहेंगे। यह केवल राजनीतिक अखाड़ा बन कर रह जायेगा। संभवत: झारखंड विधानसभा पिछले कुछ वर्षों से इसी दिशा की ओर बढ़ रहा है। क्योंकि सदन में विपक्ष का शोर-शराबा। भानूप्रताप शाही और इरफान अंसारी के भद्दे कमेंट, कुछ विधायकों की आपत्तिजनक बयानबाजी। विधायक जयप्रकाश भाइ पटेल को मार्शल आउट करने की जरूरत। सदस्य मनीष जयसवाल द्वारा प्रोसिडिंग को फाड़ा जाना। ये तमाम घटनाएं विधानसभा के भटकाव की ओर इंगित कर रही हैं।

सात दिन, पांच बैठकें, फलाफल किसके पक्ष में:
विधानसभा का मौजूदा शीतकालीन सत्र सात दिनों के लिए बुलाया गया था। इस दौरान पांच बैठकें हुईं। इस पर जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये खर्च हुए। सचिवालय से लेकर जिला स्तर के अधिकारी और कर्मी विधानसभा की कार्यवाही को लेकर किसी न किसी रूप में शामिल रहे। सुरक्षा के लिए पुलिस बल तैनात रही। यानी सैकड़ों मैनपावर का समय लगा। इस पर सोचना होगा कि इन पांच दिनों का फलाफल क्या निकला। इससे किसे लाभ हुआ। सदन केवल सरकार का नहीं होता है। यह हर सदस्य का होता है। सरकार अपने कामकाज को निकालती है। अगर देखा जाये तो शीत सत्र में सरकार इसमें सफल रही। विधेयक पास हो गये। बगैर चर्चा के अनुपूरक बजट पास हो गया। सदस्यों और जनता के हाथ क्या लगा? सदस्य न ही सवाल पूछ सके। न ही ध्यानाकर्षण पर जवाब ले पाये। न ही सरकार को किसी मुद्दे पर घेर पाये और न ही किसी पर कार्य होने का सरकार से आश्वासन ले पाये। अब अगर दल के हिसाब से बात की जाये, तो झामुमो के कुछ सदस्य भी संतुष्ट नहीं हुए। अगर ऐसा होता तो विधायक सीता सोरेन को सदन के बाहर धरना पर नहीं बैठना पड़ता। कांग्रेस की बात की जाये मॉब लिंचिंग का विधेयक पारित होना अपने पक्ष में गिना सकती है, पर झामुमो के साथ बनती दूरी को पाट नहीं पायी। कुछ कांग्रेसी विधायकों की सरकार से नाराजगी उभर रही। भाजपा विपक्ष में है। उसके विधायकों ने पांच दिन लगातार जेपीएससी को लेकर हंगामा किया, लेकिन फलाफल कुछ नहीं निकलवा सकी। किसी भी मुद्दे पर सरकार को नहीं झुका सकी। जनहित में कुछ करवा पायी, यह नहीं गिना सकती।

अधिकारी मस्त, जनता पस्त:
इन सबके बीच अधिकारी मस्त हैं। वह भी देख रहे हैं, सदन ठीक से नहीं चल रहा। सदस्यों द्वारा पूछे गये कई सवालों का वह जैसे-तैसे, आधे-अधूरे जवाब दे रहे हैं। चूंकि प्रश्नकाल नहीं हो पाया, इसलिए इन प्रश्नों पर चर्चा नहीं हो सकी। लिखित जवाब सही या गलत या आधे हैं, तो उन पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा। नतीजतन जनता के सामने सही जवाब तक नहीं आ रहा। इस बात को कई विधायकों ने सदन में भी उठाया है। शीतसत्र में कुल 293 प्रश्न आये थे। इनमें से गिनती के एक-दो प्रश्नों पर चर्चा हो सकी। 88 शून्यकाल और 20 ध्यानाकर्षण का मामला आया। ध्यानाकर्षण के एक-दो मुद्दे ही सदन में उठे। जनता के सामने बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, जन्म, मृत्यु, जाति, आय आदि प्रमाण पत्र बनवाने समेत क्षेत्र के विकास जैसी छोटी-छोटी समस्याएं हैं। जनता रोजमर्रा के जीवन में केवल सहूलियत चाहती है। इससे संबंधित सदन में क्या हुआ, जनता को इससे सरोकार है। वह सदन में उनके क्षेत्र के लिए क्या हो रहा? उनके रोजमर्रा के जीवन में कैसे सुधार होगा? उनकी छोटी-छोटी समस्याए कैसे दूर होंगी? सदन में इन सब पर क्या निर्णय हुआ। उनके जनप्रतिनिधि ने क्षेत्र के बारे में क्या बात रखी? लोग यही देखना और सुनना चाहते हंै। शीतकालीन सत्र में जनता का हाथ खाली रहा। उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

सदन को बाधित करने की परंपरा को तोड़ना होगा:
झारखंड में 2015 से 2019 तक भाजपा की सरकार थी। झामुमो और कांग्रेस विपक्ष में थे। 2019 का बजट सत्र था। विपक्षी दल के हंगामे के कारण न ही प्रश्नकाल चला न ही शून्य काल। सरकार ने 20 मिनट में बजट का काम निपटा लिया। यह कोई नयी बात नहीं थी। इस पांच साल के मानसून सत्र या शीतकालीन सत्र ऐसे ही हंगामे के बीच बीतता रहा था। मुद्दा वही स्थानीय नीति, भूमि अधिग्रहण बिल, जेपीएससी आदि थे। सत्ता में बैठी भाजपा विपक्षी झामुमो पर इसके लिए दोष मढ़ रही थी। यही परंपरा अब चल रही है। झामुमो और कांग्रेस सत्ता में है और भाजपा विपक्ष में। मुद्दे वही बने हुए हैं। जेपीएससी, नमाज का कमरा, रोजगार, स्थानीयता समेत अन्य मुद्दे हैं। अब सत्ता पक्ष में बैठे झामुमो और कांग्रेस सदन को बाधित करने के लिए भाजपा पर आरोप मढ़ रही। क्या विपक्ष द्वारा सदन को बाधित करना एक परंपरा बनती जा रही है। या सरकार की हठधर्मिता बढ़ रही है। यह एक चिंतनीय विषय है और संभवत: बहस का विषय भी हो सकता है। पर सदन में निर्धारित समय का पूरा-पूरा उपयोग करते हुए जो होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव जनिहत में हो, सदन में जनमुद्दे पर कोई फलाफल निकले, प्रयास तो इसका होना चाहिए। जनता कम से कम लोकतंत्र के इस मंदिर से तो इतनी उम्मीद रखती ही है।

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