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Wednesday, February 8, 2023
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हाई कोर्ट ने कहा, झारखंड पुलिस को कानून की पूरी जानकारी नहीं

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झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य पुलिस पर गंभीर टिप्पणी की है। पुलिस की ओर से अधूरी जानकारी देने के मामले में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में जस्टिस एस चंद्रशेखर और रत्नाकर भेंगरा की अदालत में सोमवार को सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि झारखंड पुलिस भी कानून पूरी तरह से नहीं जानती है।

कोर्ट ने कहा कि कानून के प्रति पुलिस वालों को ट्रेंड करना चाहिये। ऐसे में जरूरी है कि पुलिस प्रशासन कैप्सूल कोर्स करे।

कोर्ट ने कहा कि दूसरे राज्य की पुलिस झारखंड से व्यक्ति को पकड़ कर ले जाती है, कस्टडी में लेकर ट्रांजिट परमिट तक नहीं ली गयी। ले जाने के संबंध में कोर्ट का ऑर्डर भी नहीं है। अगर पुलिस को सूचना थी तो जाने कैसे दिया गया। मध्यप्रदेश की पुलिस की गलती जितनी है, उतनी ही गलती मामले में झारखंड पुलिस की भी है। अगर मामला ऐसा था तो सीजीएम कोर्ट में मामले को पेश किया जाता। कोर्ट चाहती तो अभियुक्त को बेल देती लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जानबूझ कर पुलिस ने अभियुक्त को जाने दिया।

कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि मामले में डिटेल एफिडेविट कोर्ट में पेश करें। सुनवाई के दौरान दिये गये एफिडेविट से प्रतीत होता है कि पुलिस को जानकारी थी, लेकिन जानबूझ कर नहीं रोका गया। कोर्ट ने कहा कि एफिडेविट में पुलिस ने स्वीकार किया है कि अभियुक्त को जाने दिया गया। ये गलत है। ऐसे में डिटेल एफिडेविट की मांग की गयी है। मामले की अगली सुनवाई नौ फरवरी को होगी। मामले में प्रार्थी नीलम चौबे हैं। उनकी ओर से अधिवक्ता हेमंत शिकरवार ने पक्ष रखा।

क्या है मामला

उल्लेखनीय है कि 24 नवंबर को मध्य प्रदेश पुलिस ने बोकारो से एक विधि छात्र की गिरफ्तारी की थी लेकिन परिजन को इसकी पूरी जानकारी नहीं दी गयी। दायर याचिका में कहा गया है कि छात्र की गिरफ्तारी के वक्त पुलिस के पास सिर्फ सर्च वारंट था, जबकि अरेस्ट वारंट अनिवार्य है। वहीं, परिजन की जगह रिश्तेदार को गिरफ्तारी की जानकारी दी गयी। अधिवक्ता हेमंत शिकरवार ने बताया कि जस्टिस डीके वासु के आदेश का भी पुलिस ने इस दौरान उल्लंघन किया है, जिसमें गिरफ्तारी के वक्त पुलिस को यूनिफॉर्म के साथ आधिकारिक वाहन में होना चाहिए। लेकिन छात्र की गिरफ्तारी के वक्त ऐसा नहीं किया गया।

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